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प्रथम दृष्टि: मेधा पर ग्रहण

अगर बिना मेधा वाले परीक्षार्थी अवैध जुगत लगाकर प्रवेश परीक्षाओं में उतीर्ण होते हैं, तो वे उन छात्रों...
प्रथम दृष्टि: मेधा पर ग्रहण

अगर बिना मेधा वाले परीक्षार्थी अवैध जुगत लगाकर प्रवेश परीक्षाओं में उतीर्ण होते हैं, तो वे उन छात्रों की हकमारी करते हैं जो उसके असली हकदार हैं

पिछले दिनों जब राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) द्वारा आयोजित अंडरग्रेजुएट राष्‍ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट-यूजी) के प्रश्नपत्र के कथित रूप से लीक होने की खबर आई, तो डॉक्टर बनने का ख्वाब संजोए लाखों युवाओं का सकते में आना लाजिमी था। दिन-रात की जीतोड़ मेहनत का फल मिलने के बदले उन्हें ऐसा सदमा लगा, जिससे जल्दी उबरना उनके लिए आसान नहीं। यह सिर्फ उनके करियर का सवाल नहीं है। उनके सपने सिर्फ उनके सपने नहीं होते। ये सपने उन तमाम मध्य और निम्न वर्गीय परिवारों के होते हैं जहां उनके बेहतर से बेहतर पढ़ाई का जिम्मा राशन खर्चों की कटौती कर उठाया जाता है। कोई घर से दूर कोटा जैसे शहर में कोचिंग लेता है, तो कोई घर बैठे महंगे ऑनलाइन माध्यम से पढ़ाई करता है। सबका लक्ष्य एक होता है, प्रवेश परीक्षा में अच्छी रैंक लाकर देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में दाखिला लेना। लेकिन, इस बार परीक्षा परिणामों की घोषणा के बाद जैसे ही अनियमितताओं की एक के बाद एक खबरें सामने आने लगीं तो उनकी आशाएं धूमिल हो गईं। इनमें अधिकतर परीक्षार्थी ऐसे हैं, जो वर्षों से इसकी तैयारी कर रहे थे। उनके लिए लीक की खबर किसी वज्रपात से कम नहीं थी, भले ही देश के आमजन के लिए यह कोई अप्रत्याशित घटना नहीं थी। पिछले तीन दशक से अधिक समय से राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर की कई परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाएं निरंतर होती रही हैं। यहां तक कि लगभग साढ़े तीन दशक पहले देश की सबसे प्रतिष्ठित समझी जाने वाली सिविल सर्विसेज की प्रारंभिक परीक्षा प्रश्नपत्र के लीक होने के कारण एक बार रद्द कर दी गई थी। गौरतलब है उस दौर में न तो इंटरनेट की सुविधा थी, न ही मोबाइल फोन पर व्हाट्सऐप जैसे माध्यम थे, जिनके जरिए किसी प्रश्नपत्र का फोटो कुछेक सेकेंड में देश के कोने-कोने तक पहुंचाए जा सकते थे, जैसा कि आजकल हो रहा है। जाहिर है, प्रश्नपत्र लीक करवाने वाले संगठित गिरोह का इतिहास पुराना है। ताजा घटनाओं से इस बात की पुष्टि होती है ऐसे गिरोहों की पैठ सिस्टम में तब भी गहरी थी जब प्रवेश परीक्षाएं पूरी तरह से ऑफलाइन हुआ करती थीं, और अब भी हैं जब नई तकनीकों की मदद से उन्हें संपन्न कराया जा रहा है। दरअसल डिजिटल युग में परीक्षा तंत्र को धता बताने वाल माफियाओं को और सहूलियत हो गई है। तकनीक की मदद से वे धोखाधड़ी के नित नए तरीकों का इजाद करने लगे हैं। ऐसे शातिर गिरोह न सिर्फ प्रश्नपत्रों को लीक करते हैं बल्कि भारी रकम लेकर परीक्षार्थियों को उतीर्ण कराने का जिम्मा भी लेते हैं। जितनी बड़ी प्रवेश परीक्षा उतनी बड़ी कीमत। इन गिरोहों के लिए कुछ ऐसे लोग काम करते हैं, जिन्होंने स्वयं ऐसी परीक्षाएं पास की हैं। 2003 में हुए एम्स परीक्षा लीक कांड का सरगना रणजीत डॉन एमबीबीएस डिग्रीधारी है। ऐसे गिरोह छद्म उम्मीदवारों को अन्य परीक्षार्थियों के स्थान पर डमी के रूप में

परीक्षा दिलाते हैं। पिछले तीन दशकों में ऐसे न जाने कितने ‘मुन्नाभाईयों’ को गिरफ्तार किया गया। इन पर नकेल कसने के लिए सीबीआइ जांच सहित न जाने कितनी कार्रवाइयां हुईं लेकिन ठोस नतीजा कुछ नहीं निकला। तमाम गिरफ्तारियों के बावजूद प्रश्नपत्र लीक करने वालों पर उनका कोई असर नहीं हुआ और वे अपने काम बेफिक्र होकर करते रहे।

इन घटनाओं से एक बात तो स्पष्ट होती है कि जहां एक तरफ ऐसे परीक्षार्थी हैं जिनके पास अपनी मेधा और कड़ी मेहनत के अलावा परीक्षा पास करने का कोई दूसरा जरिया नहीं होता। दूसरी तरफ ऐसे भी छात्र होते हैं, जो रैंक पाने के लिए शॉर्ट-कट उपाय ढूंढते हैं। वे आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों से आते हैं, जिनके अभिभावक उन्हें डॉक्टर, इंजीनियर या सरकारी अधिकारी बनाने के लिए मुंहमांगी रकम देने को तैयार होते हैं। इन घोटालों में परीक्षा संपन्न करवाने वाली संस्थाओं में संबद्घ लोगों की संलिप्तता के आरोप भी लगते रहे हैं, जिन्हें आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता।

लेकिन, ऐसे मामलों में सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि अगर बिना मेधा वाले परीक्षार्थी ऐसी जुगत लगाकर प्रवेश परीक्षाओं में उतीर्ण होते हैं, तो वे उन छात्रों की हकमारी करते हैं, जो उसके असली हकदार हैं। कई मेधावी छात्र इन परीक्षाओं में असफल होने के बाद निराशा और हताशा में डूब जाते हैं। हाल के वर्षों में प्रवेश परीक्षाओं में असफल होने पर कई छात्रों की आत्महत्या तक की खबरें आई हैं।

आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है? परीक्षा लीक जैसी घटनाओं से यह जाहिर होता ही है कि सिस्टम में अभी भी कई खामियां मौजूद हैं, जिन्हें अविलंब दूर करने की जरूरत है। लगातार तीसरी बार सत्ता में आने वाली मोदी सरकार को तमाम प्रवेश परीक्षाओं में होने वाली अनियमितताओं को दूर कर राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी लीक-प्रूफ व्यस्था बनानी पड़ेगी जिससे इसमें संलग्न सभी गिरोहों पर अंकुश लग सके। देश का हर वह छात्र जो सिर्फ और सिर्फ मेधा के बल पर जीवन में आगे बढ़ने का सपना देखता है, उसे एक पाक-साफ परीक्षा तंत्र और साफ-सुथरी व्यवस्था पाने का पूरा हक है।

 

 

 

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